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भीतर का आदमी | अरुण कुमार सिंह

सारा कुछ चुनने को है के बीच से क्या चुनना है - इसका चुनाव मैं कभी नहीं करता। जो चुनाव करता है वो भीतर का आदमी है। वो सब देखता है, सब सुनता है, मुझसे देखने सुनने का ढोंग करवाता है, मुझसे हर बात को नापने तौलने का झूठ बुलवाता है और अंत में खुद के चुनाव मेरे जरिए करवाता है। मैंने इस भीतर के आदमी को नाम दे दिया - कौन। हां, कौन। मेरे भीतर कौन रहता है।


मैंने जब सबसे पहले ये बात अपनी मां से कही तो वो कहने लगी तुम्हारे अंदर शिव रहता है। मेरी मां शिव की बहुत पूजा करती हैं। उन्हें हमेशा डर सताता रहता है कि अगर किसी दिन पूजा छूट गई तो शिव नाराज हो जाएंगे। जब जब उनसे पूजा छूटी है - उनके सपने में सांप आए हैं। ये देखकर मेरे भीतर के आदमी - अरे, माफ़ करना - कौन ने मेरा मुंह पकड़कर पिताजी के सामने खड़ा कर दिया और मेरे मुंह के भीतर से बोला - पिताजी, मां शिव की पूजा डर के कारण करती हैं?


इस पर पिताजी खूब हंसे। मां आंगन में शिव स्तुति पढ़ रही थी। उस समय तो कुछ नहीं हुआ। पर फिर जो तांडव हुआ है मेरे ऊपर। वो कौन को नहीं मुझे झेलना पड़ा है। वो पहला वकफा था जब मैंने देखा कि सारा कुछ चुनने के बाद भी सारे कुछ से अछूता भीतर का आदमी रहता है। ये कौन है। मेरे भीतर का आदमी। मेरे भीतर कौन रहता है। कौन सारे कुछ के बीच में सारे कुछ से अछूता रहता है।



ऐसे ही एक रात हवा बिल्कुल बंद थी। जैसे किसी ने बोतल का ढक्कन बंद कर दिया हो। खूब सन्नाटा। तब हम सब छत पर सोते थे। मुझे नींद नहीं आ रही थी। तब मैंने बगल में अपने भाई को भी जागते देखा। मैंने उससे पूछ लिया - भाई, तेरे भीतर कौन रहता है? इस पर वो मुझे अजीब नज़रों से देखता रहा। और मेरे सिर पर एक चपत लगाकर बोला - ज्यादा पागल बनाया तो रख दूंगा कनपटी पर खींच के। सो जा चुपचाप। मेरे भीतर मैं नहीं रहूंगा तो क्या तू रहेगा?


मैं बहुत देर तक सोचता रहा कि जो मेरा कौन है वो भाई का मैं है। पूछना तो आगे बहुत कुछ था कि क्या मेरे कौन की तरह तुम्हारा मैं सब देखकर, सुनकर, सबके बीच रहकर भी सबसे अछूता है - पर चपत के डर से मैं चुप रहा। कौन ने बड़ी कोशिश की मेरे मुंह खुलवाने की पर मैंने ठान लिया था कि कुटना नहीं है। मेरे भीतर एक आदमी कौन रहता है। कौन बड़ी मेहनत करवाता है।


फिर बहुत दिनों में मुझे पता चला कि असल में भाई के भीतर कौन वाला मैं नहीं - भाई वाला मैं रहता है - मतलब वो खुद ही खुद के भीतर रहते हैं। यानी वो ही सब देखते हैं, सब सुनते हैं, सब परखकर चुनते है - उनके भीतर ऐसा कोई नहीं जो सबसे अछूता हो। और जैसे ही ये बात कौन ने मुझे बताई मैं नाचने लगा - बहुत तेज़। पूरे आंगन में। मां शिव स्तुति करते करते मेरे चपत लगा गईं तो मैं बाहर भाग गया।


ये जो मेरे भीतर का आदमी है ना - कौन, हां कौन - ये बड़ा कायर है। बताऊं ये कैसे जाना? तो हुआ ये मास्टर साहब ने दिए सवाल। बोले करके लाओ चार। मैं घर पहुंचा - सारा पढ़ा लिखा - अच्छा ऐसे मौके पर मुझे कौन से बड़ी जलन होती है - ये पढ़ना लिखना भी मुझे पड़ता है - भीतर के कौन को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती - आलसी कहीं का!! तो पढ़ने लिखने के बाद भी हुए ना सवाल। भाई से पूछा - चपत मिली कि कौन से पूछ। मुझे लगा भाई के मैं को भी नहीं आते - पर कहा नहीं, वरना फिर चपत मुझे मिलती।


सोचा सुबह उठूंगा, जल्दी भागूंगा - रिंकू होशियार की कॉपी से टीपूंगा नकल। काम बराबर हो जाएगा। शुरू में मैं खुश हुआ कि मस्त सोचा है मैंने पर थोड़ी ही देर में भीतर के आदमी - वहीं कौन ने सारा क्रेडिट खा लिया। ऐसे मौकों पर कौन से लड़ा नहीं जाता। ठीक ही लगता है कि ये सब मैं नहीं सोच सकता - ये भीतर का आदमी ही सोच सकता है।


तो सुबह हुई, पहुंचे स्कूल, रिंकू होशियार खेल रहा था भागमभग। कॉपी से टीपी नकल और रख दी चुपके से। मास्टरजी आए। सवाल जांचे सबके और यहीं पर गुड़ गोबर हो गया। रिंकू होशियार निकले फिसड्डी - सारे सवाल गलत। अब उनके चलते मेरे भी गलत। मास्टर साहब का माथा ठनका - बोले ये बताओ किसने किसकी नकल करी। और बस तभी भीतर के आदमी - कौन ने पहले सुनता शिव स्त्रोत और फिर मुझसे बुलवाया - मास्टरजी, में शिव स्त्रोत बोल के कसम खाता हूं - सवाल मैंने खुद से किए, नकल रिंकू होशियार! नहीं... रिंकू फिसड्डी (मास्टरजी ने तभी नाम बदला था) ने की है - और इतिहास गवाह है शिव स्त्रोत बोलने वाले झूठ नहीं बोलते। बस हो गया काम। बच गया मैं, बच गया कौन। और कुटाई हुई रिंकू होशियार नहीं... फिस... नहीं रिंकू की।


पर उस दिन स्कूल से आते हुए तालाब में जब अपने को देखा तो दिखा भीतर का आदमी बहुत छिप के बैठा है कोने में। और मेरे मुंह से निकला - कायर। मेरे भीतर एक आदमी रहता है। कौन। मेरे भीतर कौन रहता है। कौन सब देखता है, सब सुनता है, सब परखता है - फिर चुनता है। कौन सब के बीच में रहकर सबसे से अछूता है। और कौन कायर है।


तो कभी कभी मुझे लगता मैं खास हूं कि मैं एक नहीं दो हूं - मेरे भीतर एक दूसरा आदमी कौन रहता है। पर ये बात कहूं किस्से? ये खुशी बांटूं किससे? पिताजी से कहूंगा तो वो हंसेंगे। मां हर बार भीतर के आदमी को शिव कह देती हैं। भाई भीतर के आदमी को मैं कह देता है। बचा कौन - गोलू। मेरा सबसे अच्छा दोस्त।


गोलू गोल है। उसके बाल बचपन से नहीं हैं। हम सब ने उसका बड़ा मजाक उड़ाया है। किसी को नहीं पता गोलू ऐसा क्यूं है पर खबर है कि पिछले जन्म के पाप हैं। जिनका प्रायश्चित इस जनम में कर रहा है। इस पर कौन ने एक बार कहा था कि प्रायश्चित का चुनाव हमारे हाथ में है - पर हमें पता नहीं है। मैंने जस के तस ये बात पिताजी के सामने बोली तो सबने ऐसे देखा जैसे मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं। मैं चुपचाप उनकी बैठक से खिसक लिया था।


तो गोलू से मैंने कहा कि यार गोलू, मेरे भीतर एक आदमी रहता है। कौन। जो सब देखता है, सुनता है, परखता है फिर चुनता है पर सबके बीच रहने पर भी अछूता रहता है। तेरे भीतर कौन रहता है? इस पर वो बहुत देर सिर खुजाता रहा। फिर बोला यार, नहीं पता। बहुत कठिन है। कल बताऊंगा। मैं खुश हो गया कि कल पता चल जाएगा। रात को नींद नहीं आई। रात भर मेरे भीतर कौन करवट बदलता रहा कि यार अगर गोलू के भीतर कौन हुआ तो क्या दोनो की दोस्ती करवा पाएंगे? ये भीतर का आदमी अकेला महसूस करता होगा? और फिर मैं सो गया।


अगले दिन सवेरे सवेरे मैं गोलू के घर के सामने के पीपल के नीचे खड़ा था। गोलू को आवाज़ देने पर गोलू आया। मैंने पूछा। गोलू ने सिर खुजलाया फिर बोला - यार, मेरी दादी कह रही हमारे भीतर पहले कभी भगवान रहता था पर अब पाप रहता है। वो हमसे बुरे बुरे काम करवाता है। तो भगवान को वापस लाने के लिए अच्छे कामों की एक लंबी लिस्ट है वो किया करूं।


अबे!! ये सबके भीतर का आदमी अलग क्यूं है!! ये सवाल सर खपाने लगा। मैं गोलू को उसके अच्छे कामों की लिस्ट के साथ छोड़ आया। और अपने आंगन में बैठ गया। मां ने उलझन में देखा तो भविष्यवाणी कर दी कि शिव से मांगो, हर सवाल का जवाब मिलेगा। मैं और परेशान - अंदर वाले शिव से मांगू कि बाहर वाले? पूछने की हिम्मत ना हुई तो मैं टीवी देखने लगा।


टीवी में आ रहा था श्री कृष्ण का नाटक। उसमें दिखाया कि श्री कृष्ण के मूंह के भीतर ब्रह्माण्ड। फिर अंदर से शिव, नहीं, कौन बोला कि ब्रह्मांड में पृथ्वी, प्रथ्वी पर मैं। मेरे भीतर कौन। पर गोलू की दादी बोली हमारे भीतर भगवान। मां कहती हैं मेरे भीतर शिव। शिव भगवान। श्री कृष्ण भगवान। भगवान के मुंह के भीतर ब्रह्मांड। ब्रह्मांड के भीतर पृथ्वी। पृथ्वी पर मैं। मेरे भीतर कौन। नहीं, शिव, नहीं भगवान, नहीं मैं... ऑफो.. उलझ गया। मेरे भीतर कौन है या कौन के भीतर मैं? फिर मैं कौन हूं? या कौन हूं मैं? फिर भीतर का आदमी कौन है? ये सवाल है कि बता रहा हूं। और मैं चक्कर खाकर गिर पड़ा। मेरे भीतर एक आदमी कौन रहता है। जो सब के बीच रहकर सबसे अछूता है। चक्कर से भी। वो बहुत सोचता है।


आंख खुली तो डॉक्टर का आला मेरी आंखो के सामने। अहा!! इसे पता होगा। मैंने डॉक्टर को पकड़ा और कान में पूछा - डॉक्टर साहब, मेरे भीतर कौन रहता है? डॉक्टर ने मेरे कान में बोल दिया - तुम्हारे भीतर कोई नहीं रहता, शरीर के अंग हैं - पेट, लिवर, आंत, दिल, दिमाग, फेफड़े और ना जाने क्या क्या!! अब मुझे बुखार - ये तो कुछ और ही निकला। फिर ये भीतर हंस कौन रहा है? पर डॉक्टर की शक की नजर आ जाएगी इस डर से मैं चुप रहा। कौन मेरे भीतर बहुत देर तक हंसता रहा।


फिर मेरे मन में आया कि सारा कुछ लिख दूं - सामने से मैं देखूंगा तो भीतर के आदमी को भी चुनने में आसानी होगी कि असल में कौन है कौन। तो वहीं किया। पर चुन नहीं पाया। मेरे भीतर एक आदमी कौन रहता है। वो कभी कभी चुन नहीं पाता। तब वो मेहनत भी करवाता है और परेशान भी करता है। पर इन सबके बीच भी वो अछूता रहता है।


फिर गोलू ने सलाह दी कि मैं सबसे पूछूं एक चिट्ठी के जरिए कि आपके भीतर कौन रहता है? तो वही कर रहा हूं।


सारा कुछ चुनने को है के बीच से क्या चुनना है - इसका चुनाव मैं कभी नहीं करता। जो चुनाव करता है वो भीतर का आदमी है। वो सब देखता है, सब सुनता है, मुझसे देखने सुनने का ढोंग करवाता है, मुझसे हर बात को नापने तौलने का झूठ बुलवाता है और अंत में खुद के चुनाव मेरे जरिए करवाता है। मैंने इस भीतर के आदमी को नाम दे दिया - कौन। हां, कौन। मेरे भीतर कौन रहता है। पर वो चुन नहीं पा रहा। क्या आप मेरी मदद करेंगे? तो बता दीजिए आपके भीतर कौन रहता है?


Arun Kumar Singh

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