कोविड -19 शिक्षाविदों के लिए चुनौतियां- अर्चना गुप्ता

कोविड19 शिक्षविदों के लिए चुनौतियां आख़िर कोविड-19 क्या है ?


कोविड-19,कल्पना से कोसों दूर -**अकल्पनीय**एक ऐसा काल,जो पृथ्वी ग्रह पर एक बुरे व भयानक दौर के रूप में सभी को रह-रह कर याद दिलाएगा कि प्रकृति से अनावश्यक छेड़-छाड़ कितनी नुक़सानदायक हो सकती है। **एक वैश्विक महामारी**के रूप में आज पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में लिए हुआ है। जिधर देखिए तबाही का मंज़र,अपनों को खोने की अपूर्णनीय क्षति, मानसिक वेदनाओं की पीड़ा से आज लगभग हर परिवार कहीं न कहीं गुज़र रहा है। लेकिन अगर ध्यान से ग़ौर करें तो बहुत कुछ बता गया,जता गया व **जाने-अनजाने जीवन को कैसे जिया जाए- बख़ूबी सिखा भी गया।**


यूँ मानव स्वभाव से नकारात्मक ज़्यादा होता है और सोचता भी ज़्यादा है जीवन से अनगिनत शिकायतों को बताता रहता है लेकिन वास्तव में ऐसा ही हो, ये ज़रूरी नहीं है। अच्छी-बुरी घटनाएँ सभी के जीवन में आती है लेकिन हम कैसे लेते है बस आगे का जीवन हमारे इन्हीं निर्णयों पर ही आधारित होता है।

**कठिन समय की सीख ही जीवन अनमोल पूँजी है,सहेज कर रखना,ये जीवन की संजीवनी बूटी है।** मैं स्वयं एक शिक्षाविद हूँ और स्वाभाविक रूप से इस समस्या से रुबरु हुई हूँ और अभी भी ये शिक्षा जगत के लिए एक चिंता व चिंतन का विषय लगातार बना हुआ है। मार्च-19 में विद्यालयों के बंद की घोषणा ने यकायक सारे शिक्षा से जुड़े व्यक्तियों यानि शिक्षक व अभिभावक दोनो के लिए ये गहन चिंता का विषय बना दिया कि बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा I भारत एक सम्भावनाओं का देश है।** ”आपदा से अवसर” **एक गुरु मंत्र,हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने एक आशा व एक नयी उम्मीद की किरण जगाने के रूप में दिया। **दुख विपत्ति या परेशानी क्या है आख़िर इसकी कहानी एक परीक्षा है,जानी -पहचानी जिसमें हारा वही,जिसने इससे लड़ने की ही नहीं ठानी।**


विद्यालयों के सामने भी ये अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो गई क्योकि हर विद्यालय हर प्रकार की सुविधाओं व तकनीकी रूप से विकसित नहीं है।शिक्षाविदों ने आनलाईन के द्वारा बच्चों को इससे जोड़ने का निर्णय लिया।ये इतना आसान न था और न अभी भी हो पाया है।**अभी भी बहुत सारे जगहों पर नेटवर्क की उपलब्धता नहीं है।** आनलाईन में हर शिक्षक इस व्यवस्था के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं है और ज़्यादातर विद्यालयों में स्मार्टरुम/कम्प्यूटर भी नहीं है।इसमें एक व्यावहारिक और कारगर मॉडल का होना अतिआवश्यक है।प्रत्येक विद्यालय के पास इस हेतु सुदृढ़ व सही तरीक़े से बनी व्यवस्था होनी चाहिए। **इस संदर्भ में कुछ सुझाव भी आए है।**


• जैसे केवल चार विषयों हिंदी,अंग्रेज़ी,विज्ञान व गणित लिए जाए व इनमे अन्य विषय जैसे भूगोल को विज्ञान में,इतिहास को हिंदी कहानियों व नाटकों में,नागरिक शास्त्र की विषयवस्तु को अंग्रेज़ी विषय के साथ कहानी या निबंध के रूप में समाहित किया जाए।

• इस पढ़ाई में विद्यार्थियों में सिरदर्द, बैचेनी,आँखों की थकान व मानसिक परेशानियों से बचाने के भी विभिन्न सुझाव आए। जैसे:

• लंबे अभ्यासों व प्रश्नों की बजाय छोटे,प्रमुख व महत्त्वपूर्ण बिंदुओ पर लिखवाया जाए।

• विद्यार्थियों के अन्दर हमें** “स्वयं पढ़ने,खोजने की प्रवृति को जागृत करने वाली शिक्षण पद्धति तैयार करनी होगी।**

• वर्तमान समय में हमारे *राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् को भी इस नयी व्यवस्था के अनुरूप नया पाठ्यक्रम व उससे जुड़े सभी पहलुओं पर विचार करके नए तरीक़े इज़ाद करने चाहिए। हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा इस शिक्षण पद्धति के अंतर्गत **“प्रज्ञाता” **नाम से दिशा निर्देश में शिक्षण अवधि तय की गई है।

• प्री-नर्सरी-नर्सरी के लिए 30-35 मिनट एक दिन एक बार

• पहली से आठवीं के लिए 40-45 मिनट एक दिन में (अधिकतम 2 कक्षाएं)

• नवीं से बारहवीं के लिए 30-45 मिनट (अधिकतम 4 कक्षाएं) **ये सरकार द्वारा उठाया गया एक बहुत सराहनीय क़दम है।** **संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस **ने कहा कि कोरोना वायरस भीषण वैश्विक संकट है,जो पूरी दुनिया में हर किसी के लिए ख़तरा है।इसके बहुत दूरगामी आर्थिक प्रभाव है,जिससे मंदी आएगी और ऐसी मंदी आएगी कि इतिहास में उसकी कोई मिसाल नहीं देखी गई होगी।

• आमतौर पर मोबाईल माता पिता के अपने कार्य के लिए भी होते हैं लेकिन अगर बच्चे को देते हैं तो स्वयं अभिभावकों का कार्य रुक जाता है।

• सभी लेकिन अपनी ज़रूरतों के हिसाब से नेटवर्क के लिए डाटा लेते हैं लेकिन अब पढ़ाई इस पर होने से अतिरिक्त ख़र्चा भी बढ़ गया जिसे पूरा करना हर किसी के लिए संभव नहीं था। बहुत से घरों में काफ़ी व्यक्तियों की नौकरियाँ या तो ख़त्म हो गई या तनख़्वाह आधी हो गई।ऐसी स्थिति में जहाँ घर चलाना मुश्किल था वहाँ बच्चों के लिए अलग से आनलाईन पढ़ाई की व्यवस्था करना बेहद तनाव भरा काम था।फिर भी अधिकांश अभिभावकों ने हरसंभव पूरी कोशिश की,जिसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम होगी। जीवन के ख़राब दौर में कैसे हमें किस बात की प्राथमिकता जीवन में तय करनी चाहिए,ये **विश्व का सबसे बड़ा गुरु वक़्त ही सिखाता है।** ना से कुछ बेहतर बस ऐसा ही आनलाईन व्यवस्था का हाल रहा है, स्कूल की जगह न तो ले पाया है और न ही संभव है। विद्यालय सिर्फ़ शिक्षण संस्थान ही नहीं है अपितु उससे भी कहीं ज़्यादा जीवन मूल्यों व जीवन जीने की पद्धति,सीखने व सिखाने की प्रयोगशाला हैजहाँ हर शिक्षक अपने विषय में अनेकों उदाहरणों से,इतिहास के स्वर्णिम पन्नों से आज की सोच व कैसे अपने अतीत से सीख लेकर आगे बढ़ सकते हैं , कुछ नवनिर्मित प्रयासों से जीवन को बेहतर बना सकते हैं,बताने व समझाने का प्रयास करते हैं। पढ़ना व शिक्षित होना बेहद ज़रूरी है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा एक सवेंदनशील, ज़िम्मेदार नागरिक बनना हर किसी के जीवन का परम उद्देश्य होना चाहिए। सिर्फ़ पढ़ाई ही नहीं अपितु एक साथ मिलजुल कर कैसे हम रहते है ये जीवन में संगठन के अमूल्य पाठ भी बच्चे के लिए जानना अतिआवश्यक है कि **एक साथ सामूहिक प्रार्थना की शक्ति,सामूहिक रूप से एक साथ ख़ाना ख़ाना, एक दूसरे के साथ अपनी चीज़ों को बाँटना,अपने साथी की मदद के लिए ख़ुशी व्यक्त करना, ये जीवन की वो अमूल्य आदतें है जोकि एक मानव के सामाजिक प्राणी होने के नाते आनी बहुत ज़रूरी है।**

**वसुधैव कुटुम्बकम्**सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है।इसका अर्थ है- धरती ही परिवार है (वसुधा एव कुटुम्बकम्)। यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है। इस व्यवस्था में ये भावना व **अतिथि देवों भव **जैसे संस्कार भी मानों अब ग़ायब से होते जा रहे है।


आनलाईन पढ़ाई में **अनुशासनहीनता**बढ़ती जा रही है।विडीओ बंद करके किसी ओर अपने कार्य में व्यस्त रहना,कई बार लेटे-लेटे बस सुनते रहना,पढ़ाई की तरफ़ ध्यान न देना लेकिन बाद में उपयुक्त नम्बर न आने पर विद्यालयों को दोष देना भी कई बार प्रायः विद्यालयों की कार्यप्रणाली पर बेवजह दोषारोपण करना सबसे ख़राब बात रही।


शिक्षक की नज़र से यदि देखे तो अधिकांश के लिए ये बिल्कुल नयी व्यवस्था थी लेकिन **सभी शिक्षक व विद्यालय इसके किए बहुत प्रशंसा व बधाई के पात्र है जिन्होंने न केवल इस चुनौती को स्वीकार किया अपितु पूरे दमख़म से बच्चों के लिए अपना पूरा समय भी दिया।** ख़ासतौर पर महिला शिक्षकों के लिए ये सब बहुत कठिन था क्यूँकि कोरोना की वजह से घर के कार्यों के सहायक व्यक्तियों के (maids)कार्य की ज़िम्मेदारी भी अब उन के ऊपर थी। सकारात्मक रूप से अब लगभग ज़्यादातर विद्यालय इस को कोरोना समय के बाद भी अपने अपने विषयों में अतिरिक्त जानकारी देने के लिए जारी रख सकेंगे।ये बात अब सभी सोचने लगे हैं। बच्चे भी **एक नए तरीक़े की पढ़ाई से पढ़े**और जिज्ञासु स्वभाव होने की वजह से दुनिया को और जाना व उन्हें भी सच में दुनिया पास नज़र आने लगी है व अन्य देशों की सभ्यता,उनका रहन-सहन,उनकी जीवन शैली जानने का अवसर मिला। कुल मिला कर इस महामारी ने हम सबसे बहुत कुछ छीना भी है पर विपत्ति एक इम्तिहान की तरह होती है,जिसने मुस्कुरा कर इसे जीत लिया,मान लीजिए बस वह अपने जीवन में आगे बढ़ गया। **शिक्षक एक गुरु एक चिंतक एक मार्गदर्शक की तरह होता है जो न अपना धैर्य खोता है और न ही अपने छात्रों को खोने देता है।** सभी महानुभावों को जो शिक्षण जगत से जुड़े है उनके इस जज़्बे के लिए दिल से सलाम।


ऐसा सभी का मानना व कहना है कि:

“मैं एक शिक्षक हूँ”


एक अध्यापक,मैडम,मैम व गुरु जैसे हैं मेरे नाम

प्राचीन काल से रूप अनेक,पर शिक्षित करना ही है काम।


नन्हें-नन्हें शिशुओं को बनाना भावी नागरिक महान

बन कर सक्षम, माँ-पिता व देश का करें जो उँचा नाम।


दुनिया का सबसे ऊँचा स्थान,माँ,समाया हर शिक्षक में

गर नहीं है पास,न आएँ करने धूमिल,पावन शिक्षण मंदिर में।


कुम्हार जैसा हमारा काम,नित गीली मिट्टी को गढ़ना

कोरे काग़ज़ से मन में,ज्ञान व अनुशासन को है भरना।


काल की गति के रुख़ को मोड़ने का गुण सिखाना है